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RD Burman: संगीत का वो साइंटिस्ट, जिसने गिलास और बोतलों से ऐसे गाने बनाए, दुनिया अचंभित रह गई

Arun Sharma

By Arun Sharma

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जब हाथों में हुनर हो तो बेजुबान साज भी बोल उठते हैं, लेकिन जब हाथों में जादू हो तो बेजान चीजें स्वर लहरियों में बदल जाती हैं. और संगीत ऐसा कि कदम खुद ब खुद थिरकने पर मजबूर हो जाएं. लय और ताल ऐसी, जो बरसों-बरस संगीत की दुनिया को रोशन करती रहे. धुन ऐसी की संगीत की दुनिया से जुड़े तमाम कलाकार उसे एवरेस्ट मान लें. हिंदी फिल्म जगत में ऐसे हुनरमंद बेहद कम हुए हैं. आर.डी. बर्मन यानी पंचम दा इनमें से एक हैं. पंचम दा के हाथों का जादू था जिसने भारतीय संगीत की दुनिया को नई बुलंदियों तक पहुंचाया. आज भी उनकी बनाई धुनें फिल्मी गानों में बेधड़क इस्तेमाल की जा रही हैं. उनके गाए गीत आज भी म्यूजिक क्लबों और पार्टियों की शान बने हुए हैं.

कानों में जब गिलास के टकराने की आवाज सुनाई देती है तो ‘यादों की बारात’ फिल्म का गाना ‘चुरा लिया है तुमने’ याद आता है. इस गाने का म्यूजिक तैयार करने में पंचम दा ने गिलास का इस्तेमाल किया था. ऐसे ही फिल्म ‘जमाने को दिखाना है’ का गाना ‘होगा तुमसे प्यारा कौन’ में ट्रेन की आवाज लाने के लिए आरडी बर्मन ने सैंड पेपर का इस्तेमाल किया था. सैंड पेपर को आपस में रगड़ने से रेलगाड़ी की आवाज़ निकलती है.

संगीत का वैज्ञानिक

फिल्म ‘खुशबू’ के गाने ‘ओ मांझी रे’ के लिए तो उन्हें गांव वाला फील लाने के लिए आटा चक्की से आने वाली आवाज चाहिए थी. इसके लिए पंचम दा ने सोडा-वाटर की दो बोतलें मंगवाईं. इनमें से वो एक-एक करके हर बोतल से थोड़ा सा सोडा खाली करते और उसमें हवा फूंकते. जिससे ‘थुप ठुक, थुप ठुक’ की आवाज निकलती थी. पंचम दा ने इसी तरह का प्रयोग शोले फिल्म में भी किया. इस फिल्म के ‘महबूबा-महबूबा’ गाने में भी आधी भरी बोतल में फूंक मारकर गाने का बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार किया गया. इसके अलावा ‘किताब’ फिल्म के एक गाने में पंचम दा ने अनोखा जुगाड़ बिठाया. गुलजार साहब का लिखा गाना ‘मास्टरजी की चिट्ठी आई’ बच्चों पर फिल्माया जाना था. अब बच्चे गाना गाते हुए स्कूल बेंच को ही पीटेंगे. इसको ध्यान में रखते हुए पंचम दा ने अपने ऑर्केस्ट्रा में स्कूल बेंच को बजवाया. म्यूजिक में इस तरह के अनोखे प्रयोगों की वजह से पंचम दा को संगीत का वैज्ञानिक कहा जाने लगा.

आरडी बर्मन कैसे बने पंचम?

27 जून 1939 को कोलकाता में जन्मे आरडी बर्मन का पूरा नाम राहुल देव बर्मन था. पिता एसडी बर्मन यानी सचिन देव बर्मन उस दौर के नामचीन संगीत निर्देशक थे. जबकि मां मीरा दत्ता रॉय बंगाली फिल्मों की जानी-मानी गायिका थीं. इस तरह आरडी बर्मन को संगीत विरासत में मिला था. राहुल देव बर्मन का नाम पंचम कैसे पड़ा इसके पीछे कई कहानियां हैं. कुछ लोगों का कहना है, बचपन में वो जब रोते थे तो उनकी आवाज इंडियन म्यूजिकल स्केल के पांचवे सुर जैसी थी. वहीं कुछ का कहना है कि वो पांच अलग-अलग तरह की आवाज में रोते थे. जबकि कुछ लोगों का कहना है अशोक कुमार या मन्ना डे ने उनका नाम पंचम रखा था. पंचम दा ने बचपन में क्लासिकल म्यूजिक की तालीम नहीं ली. म्यूजिक तो उनकी रग-रग में बसता था. पंचम दा ने अपना पहला संगीत 9 साल की उम्र में फिल्म फंटूस के लिए दिया था. इस फिल्म का गाना ‘ए मेरी टोपी पलट के आजा’ के संगीतकार एसडी बर्मन थे. उन्होंने बेटे की बनाई धुन का इस्तेमाल इस गाने में किया.

कैसा रहा संगीत का सफर?

1972 में बीबीसी लंदन को दिए इंटरव्यू में पंचम दा ने बताया- ‘मेरे हुनर को देखते हुए पिता एसडी बर्मन मुझे अपने साथ बॉम्बे ले आए. बॉम्बे में मैंने बाकायदा साज और संगीत की तालीम ली. उस्ताद अकबर अली खान से सरोद सीखा. समता प्रसाद जी से तबला जबकि सलिल चौधरी ने संगीत की बारीकियां सिखाईं. 1956 में पिता को बतौर असिस्टेंट ज्वाइन करने के बाद 6 सालों तक उनके साथ काम किया और संगीत निर्देशन का ककहरा सीखा. इस दौरान पिता एसडी बर्मन जब तब उनकी परीक्षा लेते रहते. कभी किसी गाने का मुखड़ा दे देते, और कहते- इसके अंतरे की धुन बनाओ. तो कभी अंतरा दे देते और कहते इसका मुखड़ा बनाओ.

बतौर असिस्टेंट पंचम दा ने जिन फिल्मों को संगीत दिया, उनमें से कई फिल्में सुपरहिट साबित हुईं. इनमें से कुछ फिल्में हैं- कागज के फूल, चलती का नाम गाड़ी, गाइड, तेरे घर के सामने, बंदिनी, जिद्दी और तीन देवियां. 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमर प्रेम’ के म्यूजिक डायरेक्टर पंचम दा थे. जबकि इस फिल्म का एक गाना एसडी बर्मन साहब ने गाया था. इस फिल्म के ज्यादातर गाने आज भी सुने जाते हैं. फिर चाहे वो रैना बीती जाए हो, चिंगारी कोई भड़की हो या कुछ तो लोग कहेंगे गाना हो. किशोर कुमार और लता मंगेशकर जी की बेहतरीन आवाज दिल को छू लेती है.

प्रसार भारती को दिए गए इंटरव्यू में पंचम दा बताते हैं- म्यूजिक डायरेक्शन की बारीकियां वो जल्द ही सीख गए थे. उन्हें जहां से भी कोई नई ध्वनि सुनाई देती उसे ट्यून में बदलने की कोशिश करते. फिर चाहे वो किसी तांबे-पीतल या कांच के बर्तन के टकराने की आवाज हो, किसी आटा चक्की की आवाज हो, या किसी कंघे या स्टिक की आवाज हो. उन्हें हर तरह की आवाज अपनी ओर खींचती थी.बेहद कम लोग जानते होंगे कि पंचम दा ‘माउथ आर्गन’ बहुत अच्छा बजाते थे. उन्होंने अपनी इस कला का प्रदर्शन 1958 में रिलीज हुई फिल्म ‘सोलहवां साल’ के गाने ‘है अपना दिल तो आवारा’ में किया था. देव आनंद के साथ सफर कर रहा शख्स जो माउथ ऑर्गन बजा रहा है, दरअसल वो धुन पंचम दा ने दी थी.

“गुलजार के लिखे गीत मुझे परेशान करते थे”

हर गीतकार के लिए उनका अलग नजरिया होता था. चाहें वो गुलजार साहब हो, आनंद बक्शी, मजरूह सुल्तानपुरी या कोई और गीतकार. वो हर राइटर की रूह को समझते थे. फिल्म के सब्जेक्ट के हिसाब से सुझाव भी देते थे कि गीत कौन लिखेगा? सब्जेक्ट के मुताबिक धुन बनाते थे. कहा जाता है गीतकार और संगीतकार का तालमेल हमेशा नहीं बैठता. एक गीतकार जिसके साथ तालमेल बिठाने में पंचम दा को थोड़ी मुश्किलें हुई, वो हैं गुलजार साबह. दूरदर्शन को दिए इंटरव्यू में पंचम दा बताते हैं- गुलजार के लिखे गीत मुझे अक्सर परेशान करते थे. आंधी फिल्म का गाना लेकर गुलजार साहब मेरे पास पहुंचे. मैंने मुखड़े की ट्यून तो बना दी लेकिन अंतरा उस ट्यून में फिट नहीं बैठ रहा था. तो मैंने गुलजार साहब से कहा, भाई अब अंतरे को ट्यून के हिसाब से सेट करो. गुलजार साहब घर पहुंचे और रातभर लगा उन्हें गाने के बोल को धुन में ढालने में. इस तरह सामने आया आंधी फिल्म का वो सुपरहिट गाना-‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं’

‘तीसरी मंजिल’ से मिली करियर की मंजिल

यहां 1957 में रिलीज हुई गुरुदत्त की सुपरहिट फिल्म ‘प्यासा’ का जिक्र करना बेहद जरूरी है. इस फिल्म का गाना- ‘सर जो तेरा चकराए, या दिल डूबा जाए, आ जा प्यारे पास हमारे, काहे घबराए, काहे घबराए’ तो आपने सुना ही होगा. ये गाना उस दौर के मशहूर हास्य कलाकार जॉनी वाकर पर फिल्माया गया था. इस फिल्म के संगीत निर्देशक तो एसडी बर्मन साहब थे, लेकिन इस गाने को संगीत दिया था पंचम दा ने, जो हर जुबान पर चढ़ गया. आर डी बर्मन को पहला ब्रेक 1959 में फिल्म ‘राज’ में मिला था, लेकिन ये फिल्म पूरी न हो सकी. दो साल बाद उनको महमूद की फिल्म ‘छोटे नवाब’ में संगीत देने का मौका मिला. लेकिन बतौर म्यूजिक डायरेक्टर पंचम दा को असली पहचान 1966 में रिलीज हुई फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ से मिली. इस फिल्म का म्यूजिक लोगों को बेहद पसंद आया. इसके बाद पंचम दा ने फिर पीछे मुड़ के नहीं देखा.

प्रसार भारती को दिए इंटरव्यू में पंचम दा इस फिल्म से जुड़ा बेहद रोचक किस्सा सुनाते हैं. वो बताते हैं इस फिल्म के लिए मुझे नासिर साहब ने बुलाया था. पहले देवानंद साहब इस फिल्म के हीरो थे, लेकिन उन्होंने मना किया तो शम्मी कपूर साहब को कास्ट किया गया. मुझे लगा अब ये फिल्म तो गई मेरे हाथ से. क्योंकि शम्मी कपूर की ज्यादार फिल्मों में शंकर-जय किशन म्यूजिक देते थे. नासिर साहब ने शर्त रखी कि अगर शम्मी कपूर ओके कर देते हैं, तो मुझे कोई परेशानी नहीं है. शम्मी कपूर सेट पर आए. उन्होंने मुझे बुलाकर कहा- पंचम, कुछ सुनाओ. मैं पहले से ज्यादा कुछ तैयार करके नहीं गया था. उस वक्त मुझे एक नेपाली गाना याद आया, जिसकी धुन मैंने उन्हें सुना दी. जैसे ही मैंने गाने की एक लाइन गाई, शम्मी कपूर दूसरी लाइन गुनगुनाने लगे. फिर मैंने एक-एक करके कई गानों की धुन सुनाई. जिसे कपूर साहब ने ओके कर दिया. बाद में मुझसे एक और गाने की धुन बनवाई’

महमूद ने पानी से भरी बाल्टी पंचम पर उड़ेल दी

तीसरी मंजिल के सभी गाने सुपरहिट साबित हुए. इसके बाद नासिर साहब की ज्यादातर फिल्मों को पंचम दा ने संगीत दिया. लेकिन पंचम दा ने जिस डायरेक्टर की सबसे ज्यादा फिल्मों को संगीत दिया वो थे रमेश बहल. 1970 में रिलीज हुई फिल्म ‘द ट्रेन’ से ये सिलसिला शुरू हुआ जो दर्जनों फिल्मों तक जारी रहा. पंचम दा ने केवल फिल्मों का संगीत नहीं बनाया बल्कि प्लेबैक सिंगिंग और एक्टिंग भी की है. एक्टिंग में उनको ब्रेक दिया महमूद ने. प्रसार भारती को दिए इंटरव्यू में पंचम दा एक किस्सा सुनाते हैं. वो बताते हैं कि उस वक्त ‘भूत बंगला’ की शूटिंग चल रही थी. मैं शूटिंग में पहुंचा तो महमूद के भाई ने मुझे कास्ट्यूम पहनने को बोला. जैसे ही मैं कास्ट्यूम पहनकर बाहर निकला उसने मुझपर बाल्टी भर पानी उड़ेल दिया. मैंने पूछा ये क्या बदतमीजी है, तो उसने कहा- फिल्म में बारिश का सीन है, और आप अब फिल्माए जा चुके हो. इस तरह पंचम दा को महमूद की फिल्म में एक्टिंग का पहला ब्रेक मिला.

खराब गले से गाया गाना भी हिट हो गया

पचंम दा ने कई फिल्मों में गाने भी गाए हैं. उनमें से ज्यादातर हिट रहे हैं. उनका हुनर ऐसा था कि खराब गले में भी गाना गा दें तो सुपरहिट हो जाए. उस दौरान अमिताभ की फिल्म शान की शूटिंग चल रही थी. मोहम्मद रफी साहब ने पंचम दा को यम्मा..यम्मा गाना गाने के लिए बुलाया. इस पर पंचम दा ने कहा मेरा गला खराब है. रफी साहब ने कहा- कोई बात नहीं, तुम अभी गाना गा दो, बाद में हम इसे फिर से रिकॉर्ड कर लेंगे. पंचम दा ने खराब गले में वो गाना गाया. लेकिन बदकिस्मती से रफी साहब का इंतकाल हो गया और वो गाना आज भी पंचम दा के खराब गले वाली आवाज में सुना जाता है. पंचम दा ने अमिताभ की दो और फिल्मों महान और पुकार में प्लेबैक सिंगिंग की. लेकिन ये फिल्में उतनी कामयाब नहीं रहीं.

मां की मर्जी के खिलाफ जाकर की आशा भोंसले से शादी

ये तो पंचम दा के करियर की बात, अब उनकी निजी जिंदगी भी जान लेते हैं. 70 के दशक में उनके करियर की गाड़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी. पिता एसडी बर्मन ने सोचा बेटे की शादी करा देते हैं. साल 1966 में पंचम दा की शादी रीता पटेल से करा दी गई. लेकिन ये रिश्ता लंबा नहीं चला. शादी के 5 साल बाद ही दोनों अलग हो गए. इस दौरान पंचम दा की नजदीकियां आशा भोंसले के साथ बढ़ने लगी थीं. साल 1980 में दोनों ने शादी करने का फैसला लिया. पंचम दा ने परिवार को ये बात बताई, लेकिन मां राजी नहीं हुईं.

हालांकि आशा उस दौर की जानी मानी गायिका लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं, और वो खुद भी सफल गायिका थी. इसके बावजूद पंचम दा की मां आशा को बहू बनाने के लिए राजी नहीं थी. लेकिन स्वभाव से जिद्दी पंचम दा को आशा से शादी करनी थी. तो उन्होंने कर ली. बेटे की जिद के आगे मां की एक नहीं चली. पचंम दा की लव स्टोरी की चर्चा किसी और जगह करेंगे. लेकिन इतना समझ लीजिए कि उनके दांपत्य जीवन की गाड़ी हिचकोले खाती रही. हालांकि आशा जी ने ताउम्र उनका साथ निभाया. पंचम दा बेहद भोले-भाले स्वभाव के थे. अगर उन्हें किसी बात की जानकारी नहीं होती थी तो पूछने में झिझकते भी नहीं थे.

भले ही शमशीर कितनी पुरानी हो जाए, लेकिन उसमें जंग नहीं लगी

अपने संगीत के दम पर पंचम दा ने तीन दशकों तक बॉलीवुड में धाक जमाए ऱखी. लेकिन 90 का दशक आते-आते पंचम का संगीत थोड़ा कमजोर पड़ने लगा. उनकी जगह नए म्यूजिक कंपोजर लेने लगे. जिसके चलते पंचम दा को काम मिलना बंद हो गया. हालांकि पंचम दा इस बात से थोड़े दुखी और निराश जरूर हुए लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि एकक दिन वो ऐसा म्यूजिक देंगे जो सदियों तक याद किया जाएगा. पंचम दा के करियर की शानदार पारी अभी बाकी थी.

किस्मत ने अपना रंग दिखाया और विधु विनोद चोपड़ा ने उन्हें अपनी फिल्म 1942 ए लव स्टोरी के लिए अप्रोच किया. ये ऑफर मिला तो पंचम दा बेहद भावुक हो गए थे. उन्होंने इस फिल्म को बेहतरीन म्यूजिक देकर साबित कर दिया कि भले ही शमशीर कितनी पुरानी हो जाए, लेकिन उसमें जंग नहीं लगी है. वो कुंदन हैं, जो हर बार आग में तपकर और निखर उठता है. बदकिस्मती देखिए कि पंचम दा अपनी आखिरी कामयाबी को देखने से पहले ही दुनिया से रुखसत कर गए. 4 जनवरी 1994 को दिल की बीमारी के चलते पंचम दा का निधन हो गया.

साल 1995 में विधु विनोद चोपड़ा की ‘1942- ए लव स्टोरी’ रिलीज हुई. इस फिल्म के खूबसूरत गानों को आवाज देने वाले कुमार सानू ने एक बेहद रोचक किस्सा साझा किया. उन्होंने बताया- पंचम दा से मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई थी. उनके साथ कई फिल्मों में कभी एक लाइन तो कभी, आधा लाइन गाने का मौका मिलता. लेकिन जब लव स्टोरी फिल्म का एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा गाना रिकॉर्ड हो रहा था. तब पंचम दा मेरे पास आकर बोले. इस गाने में बहुत सारे एक जैसे शब्द है. उन सभी को तुम अलग-अलग तरह से गा दोगे तो ये गाना हिट हो जाएगा.

जैसा कि पंचम दा ने कहा था फिल्म का एक गाना नहीं बल्कि सभी गाने सुपरहिट हुए. बस अफसोस इतना था कि इस कामयाबी को देखने के लिए पंचम दा इस दुनिया में नहीं थे. इस फिल्म के संगीत निर्देशन के लिए पंचम दा को 1995 का फिल्मफेयर दिया गया. इसके अलावा पंचम दा को दो और फिल्मों सनम तेरी कसम (1983) और मासूम (1984) के संगीत निर्देशन के लिए फिल्मफेयर से नवाजा गया. बतौर संगीत निर्देशक पंचम दा ने 331 फिल्मों को संगीत दिया. इनमें से 292 हिंदी फिल्में थीं. इस दौरान वो 17 बार फिल्मफेयर के लिए नॉमिनेट हुए. साल 2013 में संगीत के क्षेत्र में पंचम दा की उपलब्धि को देखते हुए भारत सरकार ने उनकी तस्वीर वाला डाक टिकट जारी किया था.

अलग धुन और अलग स्टाइल

पंचम दा की क्रिएटिविटी को आज के म्यूजिक डायरेक्टर फॉलो करते हैं. वो म्यूजिक की ‘बाइबिल’ थे. उन्होंने हर तरह के गाने बनाए. हर गीतकारों के साथ अलग-अलग काम किया. चाहे वो आनंद बक्शी साहब के साथ दम मारो दम, मजरूह सुल्तानपुरी के साथ चुरा लिया है तुमने जो दिल को, खुर्शीद हल्लौरी का लिखा गीत तुमसे मिलकर ऐसा लगा हो या गुलजार साहब का लिखा ‘लकड़ी की काठी’. हर गीत में आपको अलग धुन और स्टाइल देखने को मिलेगी. जबकि उस जमाने में टेक्नोलॉजी उतनी एडवांस नहीं थी, फिर भी पंचम दा नए-नए साउंड क्रिएट करते थे. जो भी क्रिएट करते थे वो एक अजूबा की तरह होता था. उनके धुन बनाने की अप्रोच सबसे जुदा थी. उन्हें इंडियन सिनेमा में वेस्टर्न म्यूजिक का फ्यूजन तैयार करने के लिए भी जाना जाता है. उन्होंने भारतीय बॉलीवुड संगीत जो कि 60 के दशक में केवल शास्त्रीय और पारंपरिक संगीत के सहारे चल रहा था, को एक नई दिशा देकर, नए संगीत के युग की शुरुआत की और उस दौर के बड़े संगीतकारों शंकर जय किशन, एसडी बर्मन, मदन मोहन, सलिल चौधरी और राजेश रोशन के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई.

पंचम दा के बारे में एक इंटरव्यू में अमजद खान ने कहा था कि वो उन्हें आरडी बर्मन के नाम से नहीं, पंचम और घोंचू के नाम से जानते हैं. वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, भाई है. शोले फिल्म में मेरे किरदार को सफल बनाने में पंचम की अहम भूमिका निभाई. गब्बर के आने में जो एक बैकग्राउंड म्यूजिक बजता है वो बेहद खास था. उसे पचंम ने क्रिएट किया था.

गुलजार क्या कहते हैं?

पंचम दा को याद करते हुए गुलज़ार साहब कहते हैं, पंचम को बच्चों से बेहद लगाव था, वो बच्चों की तरह महसूस करते थे, उनमें मौजूद बचपना ही था, जिस कारण उसने बच्चों के गाने के लिए यूनिक संगीत दिया. फिर चाहे वो मासूम फिल्म का ‘लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा हो’ या परिचय फिल्म का ‘सारे के सारे’ गाना हो या फिर किताब फिल्म का ‘आ इ ई…मास्टर जी की आ गई चिट्ठी’ या फिर खूबसूरत फिल्म का ‘कायदा-कायदा’ गाना. एक तरफ पंचम निहायती ट्रेडिशनल थे जिन्हें हिंदुस्तानी म्यूजिक की बेहतर समझ थी, वहीं उन्हें वेस्टर्न म्यूजिक में भी महारत हासिल थी. संगीत में उनके जैसा प्रयोग शायद ही किसी म्यूजिक डायरेक्टर ने किया हो. गुलज़ार कहते हैं, मेरे ज्यादातर गानों को म्यूजिक पंचम ने दिया है, या यूं कहूं मुझे पंचम के साथ रहकर संगीत के प्रति मेरी समझ बढ़ी.

पंचम दा के संगीत की विशेषता थी कि उन्होंने भारतीय संगीत की परंपरा को न तोड़ते हुए भी उस संगीत में ऐसी जान फूंक दी कि लोग उन धुनों को सुनकर झूमने लगते थे, फिर क्या बच्चा क्या बूढ़ा. पंचम दा को वेस्टर्न और यूरोपीय संगीत की अच्छी समझ थी. इसलिए उनकी बनाई धुनें, हर शख्स के दिल को छू जाती हैं. भले ही राहुल दा आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका संगीत भारत ही नहीं दुनियाभर में सुना जाता है. हालांकि प्रसार भारती को दिए इंटरव्यू में पंचम दा बताते हैं, कि उन्हें कैबरे सिचुएशन में लिखे गाने नहीं पसंद आते, लेकिन उस दौर में ऐसे गानों की बेहद डिमांड थी. इसलिए मुझे उन गानों के लिए धुन बनानी पड़ती थी. आज उनके बनाए कई गाने डिस्को नाइट्स और क्लब पार्टीज में सुने जा सकते हैं.

उनके सुपरहिट गीतों की बात की जाए तो फेहरिस्त बड़ी लंबी हो जाएगी. फिर भी हम आपको उन कुछ बेहतरीन गानों को बताए देते हैं. इनमें- फिल्म यादों की बारात का गाना… चुरा लिया है तुमने जो दिल तो… फिल्म जमाने से… दिल लेना खेल है दिलदार का… फिल्म शान से…. जानू मेरी जान…. फिल्म बेताब से…. जब हम जवां होंगे… फिल्म शोले से महबूबा…महबूबा… फिल्म हरे रामा, हरे कृष्णा से… दम मारो दम; फिल्म कारवां से… पिया तू अब तो आ जा; ये ऐसे यादगार गीत है जिनके रीमिक्स आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं. फिल्म संगीत की दुनिया में राहुल देव बर्मन का हमेशा पंचम रहेंगे, उनकी जगह कोई नहीं ले सकता.

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I am Arun Sharma, a versatile news writer covering entertainment, sports, and breaking news.

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